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Sister

दीदी तो मां जैसी  होती  है  और  उसका  प्यार  ममता ही होती  है  उसकी डाँट पापा जैसी  उसकी सलाह दादा जैसी  वो हमजोली  भी दोस्त जैसी होती है  उसकी बातें बिल्कुल मेरे मन जैसी होतीं  हैं  और उससे दूरी कुछ  ग्रहन जैसी  होती है  अखिर जो  सबकुछ पूरा  कर दे  जिसमें  हर रिश्ता हो  वो बहन ही तो होती  है  मेरी दीदी भी मुझे माँ जैसी लगती  है।                                      With love :)                                                       Your brother                                                        ...

friendship day

एक सफर की दौड़ में चलो आगे बढ़ते हैं पर बीच बीच में छुट्टी लेके जरा दोस्तों   से मिलते हैं तो क्या हुआ अगर आगे बढ़ने को हम शोलों पे चलते हैं राहत के लिए ही तो रास्तों में दोस्त जैस...

लेखनी -स्याही संवाद

एक लेखनी जेब में कई दिनों से पड़ी थी वो जेब से थोड़ी बड़ी थी इतनी की समझो बाहर का नज़ारा देखने साहब की जेब में खड़ी थी जब निकली जेब से तो उसने स्याही से सब कुछ कहा इतने दिनों में वो जो कुछ भी पढ़ी थी अरे स्याही! मैंने देखा दुनिया बनावटी पन से जड़ी थी वहाँ सबको बस अपनी पड़ी थी । एक ठग की दुकान तो बड़ी जमी थी बगल ही ईमानदार की आँखों में कुछ नमी थी सुविधाएँ बड़ी से बड़ी थी और भावों की बड़ी ही कमी थी एक छोटी लड़की भी असहज खड़ी थी एक बुढ़िया सड़क किनारे पड़ी थी अरे स्याही ! वहाँ सबको बस अपनी पड़ी थी कहीं बाढ़ तो कहीं वर्षा की कमी थी छोटी अब बड़ी से बड़ी थी झूठ की पंक्ति में बड़ी भीड़ खड़ी थी सत्य की राह में बस एक या दो की नज़रें गड़ी थी अरे स्याही! वहाँ बस सबको अपनी पड़ी थी ।। कलम की  व्यथा सुन कागज़ पे  स्याही अपने अंदाज़ में बह चली थी , उधर लेखनी फिर नयी कविता की खोज में चल पड़ी थी। - स्मृति तिवारी ( मेरी लेखनी से)

fate

सुना है किस्मत पर ही ज़िन्दगी चलती है पर किस्मत कुछ पन्नों पर बिखरी होती है इसका सीधा मतलब है कि किस्मत आपसे ही बदलती है इसलिए डरना नहीं है किसी भी तल्ख-ए-वाकया से , चलिये किस्...

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Name of Life

अनकही अनहोनी , अप्सरा सम्यक सम्मोहिनी , जलती आग की विरहणी, तेजवान अभ्युदायिनी , संघर्षों की मात्रिणी, ज्ञानदायिनी, गहरायी में जाती हुई अनकही सी शाम, बुझती हवा का ठहरा सा पैग...

Hit the goal

तुम क्यों डरते हो जरा कभी खुद से मिल के तो देखो तुम क्या हो ? तुम आग हो  तुमको ऐसा गौरव लक्ष्य मिला , ताकि अपनी काबिलियत इसको तुम आकार दो , आज इसी बात पे इस लक्ष्य को साकार दो   , ये ...

स्त्री

सुकून !गर्मी की पुरवाई सी नटखट!पनघट की रुसवाई सी सुरीली !बिस्मिल्लाह की शहनाई सी शांत !गहरी खाई सी चंचल !कोयल आँगन में आयी सी शर्मीली !दुल्हन सजायी सी गंभीर !समुद्र की गहरायी सी सुलझी !कमल के पत्तों पे पानी की तराई सी उलझी ! बया के नीड़ की बुनाई सी क्रोधी !आग दहकायी सी दयावान !गंगा उफनायी सी धीर !आकाश की ऊँचाई सी प्रेमी !बचपन की लरकायी सी मधुर !लड्डू की मिठाई सी खुश ! रात चाँदनी से सजायी सी ये है ईश्वर की चारमोत्कर्षित कृति                   " स्त्री " सुन्दर !ताज़महल के नक्काशों की मढ़ाई सी ।।              © ' Shail ' Smriti              मेरी लेखनी से